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Arjun S.Bisht
I enjoy reading and writing. My favorite genres are Children, Drama, Fantasy, Folklore, Inspiration, Love, Mythology, Film Scripts, Social Commentary, Travelogue. I have been a part of the Kahaniya community since 26th September 2020.
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Arjun S.Bisht
घुटन
पारावारिक संघर्षो की गाथा
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#घुटन वो साल भर का था , तब माँ का साया उसके सिर से उठ गया था , माँ क्या होती , माँ का प्यार क्या होता है , उसे कभी पता ही ना लगा। हाँ उसकी दादी जब तक थी , उसके लिये खड़ी रही , ओर वहीं कारण था की , उसका अपनी दादी से आत्मिक लगाव था। छोटे से बच्चे का पालन पोषण कैसे हो पायेगा , ये सोच कर दादी ने पिता का दूसरा विवाह कर दिया , ओर बच्चे को एक नाम की माँ मिल गई। अब इतना जरूर था की उसे माँ का प्यार भले ही ना मिला पर दो वक़्त का भोजन जरूर मिलने लग गया , ओर वो जिंदा रह गया। पर मातृत्व का अभाव उसे सदा खलता रहा , ओर जैसे जैसे वो बड़ा हुआ , उसका ये अभाव ओर बढ़ता गया। दादी के जाने के से उसे मानसिक आघात लगा , क्योंकि वह माँ रूपी सहारा से एक बार पुनः महरूम हो गया था , पर पिता के होने से उसे अब भी , किसी अपने होने का अहसास जरूर होता था। उसने इसे ईश्वर की नियति समझ कर स्वीकार कर लिया था , अब उसे ये समझ जरूर आ गई थी की , वो अन्य बच्चों की तरह , जिद्द नही कर सकता , ना ही नखरे दिखा सकता है। इसके चलते उसने चुप्पी को अपना हथियार बना लिया था , जिसने जैसे रखा उस तरह जीना सीख लिया। बड़ा हुआ तो घरवाले उसके विवाह की सोचने लगे , पर वो लगातार इंकार करता रहा , ये सोच कर की , क्या आने वाली उसकी पत्नी , उसकी तरह इन सब चीजों से सामंजस्य बैठा पायेगी। पर आख़िर घरवालों के दबाव में आकर उसने विवाह कर लिया , अब वो पति बन चुका था ओर दो बच्चों का पिता भी। उसने लगातार कोशिश जारी रखी की , उसका बनाया सामंजस्य बना रह सके , पर ये कुछ सालों के बाद टूटने लगा , लाख प्रयासों के बाद भी वो उसे कायम नही रख पा रहा था। क्योंकि उसको इसे बरकरार रखने में , परिवार के किसी ओर सदस्य का सहयोग नही मिल पा रहा था। एक दिन उसे परिवार से अलग कर दिया गया , चंद बर्तन के टुकड़े दे कर , जिसके लिये उसने अपने बालपन को मार दिया था। उस दिन वो अंदर ही अंदर खूब रोया , पर लाचार था इन सबको रोकने में , फिर उसने इसे भी ईश्वर की नियति मान कर स्वीकार कर लिया। पिता अब भी उसके लिये सेतु बने हुये थे , इसलिये वो दिनरात ये प्रार्थना किया करता था की , उसके पिता यों ही उसके सेतु बने रहे। हालाँकि अलग होने के बाद भी , उसकी मुसीबतें कम नही हो रही थी , पत्नी के बाद अब बच्चे भी , उन सबसे पीड़ित होने लग गये थे , जिनसे अब तक वो पीड़ित था। वो लगातार संघर्ष कर रहा था , इन सबसे बचने के लिये , घर में शांति स्थापित करने के लिये। वो चाहता था की था , उसकी तरह अगर उसकी पत्नी व बच्चे भी चुप्पी साध ले , तो उसके घर में शायद शांति बनी रहे। पर ऐसा हो नही पा रहा था , इसलिये वो अब पहले से ज्यादा घुट घुट कर जी रहा था।

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